अमेरिकी इतिहास ऐसे मामलों से भरा पड़ा है, जब अमेरिका ने दूसरे देशों पर चढ़ाई की, कब्ज़ा किया या पर्दे के पीछे से सत्ता पलटने की कोशिशें कीं. लेकिन पिछली एक सदी में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी पुराने सहयोगी देश की ज़मीन हड़पने और वहां की जनता की इच्छा के ख़िलाफ़ शासन करने की खुली धमकी दी हो.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था जिन राजनीतिक मर्यादाओं और साझेदारियों पर टिकी रही, उन्हें इस कदर बेरहमी से तोड़ने की धमकी भी किसी अमेरिकी नेता ने नहीं दी.
इसमें कोई शक नहीं कि अब पुराने नियम खुलेआम तोड़े जा रहे हैं, और वह भी बिना किसी डर के. आज ट्रंप को अमेरिका के शायद सबसे ज़्यादा ‘बदलाव लाने वाले’ राष्ट्रपति के रूप में देखा जा रहा है.
देश और विदेश में उनके समर्थक तालियां बजा रहे हैं, दुनिया भर की राजधानियों में चिंता की लहर है, और मॉस्को व बीजिंग चुपचाप सब कुछ देख रहे हैं.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने दावोस आर्थिक मंच पर, ट्रंप का नाम लिए बिना, बहुत सख़्त शब्दों में चेतावनी दी, “यह एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ना है जहां कोई नियम नहीं बचेगा, जहां अंतरराष्ट्रीय क़ानून को कुचला जाएगा, और जहां वही क़ानून चलेगा जो सबसे ताक़तवर होगा, एक बार फिर साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के उभार के साथ.”
अब एक संभावित, तकलीफ़देह व्यापार युद्ध को लेकर चिंता तेज़ी से बढ़ रही है. कुछ हलकों में तो यह डर भी है कि, स्थिति इतनी ख़राब हुई कि अमेरिका के सर्वोच्च कमांडर ने ग्रीनलैंड को बलपूर्वक लेने की कोशिश की, तो 76 साल पुराना नेटो सैन्य गठबंधन खतरे में पड़ सकता है.
वहीं ट्रंप के समर्थक, युद्ध के बाद बनी बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था के ख़िलाफ़, उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे के समर्थन में और ज़्यादा मजबूती से खड़े हो रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़आवर में जब यह सवाल पूछा गया कि क्या ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन होगा, तो रिपब्लिकन सांसद रैंडी फ़ाइन ने साफ़ कहा, “मुझे लगता है कि दुनिया में शांति बनाए रखने के एक मंच के रूप में संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह नाकाम रहा है. और सच कहें तो, वे चाहे जो भी सोचें, शायद उसका ठीक उलटा करना ही सही रास्ता है.”









