नई दिल्ली .SUPREME COURT / सुप्रीम कोर्ट ने एक हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की “लापरवाही भरी जांच” की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह आरोपी को 6 लाख रुपये का मुआवजा दे। इस आरोपी को बरी होने से पहले, विचाराधीन कैदी (undertrial) के रूप में 6 साल जेल में बिताने पड़े थे।
SUPREME COURT जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह आदेश तब दिया, जब वे अरुण उर्फ दीपक द्वारा दायर जमानत अर्जी पर सुनवाई कर रहे थे। दीपक को 2019 में आगरा में दर्ज एक मामले में आरोपी बनाया गया था, जिसमें बाद में वह बरी हो गया।
यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता 14 नवंबर, 2019 से जेल में था और पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (circumstantial evidence) पर टिका था, सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 23 मार्च को ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह 3 महीने के भीतर ट्रायल पूरा करे।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को देखने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा की गई जांच के तरीके पर हैरानी जताई।
फैसला लिखने वाले जस्टिस चंद्रन ने कहा, “अभियोजन पक्ष ने केवल 6 गवाहों से पूछताछ की – शिकायतकर्ता, डॉक्टर, एक हेड कांस्टेबल, एक सब-इंस्पेक्टर, एक सर्कल ऑफिसर (जांच अधिकारी) और एक स्वतंत्र गवाह। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत न होने के बावजूद, उसे 6 साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहना पड़ा। एक बेहद लापरवाह जांच के आधार पर मनमाने ढंग से मुकदमा चलाया गया, लेकिन अच्छी बात यह रही कि अंत में आरोपी बरी हो गया।”
कोर्ट ने कहा कि जांच और अभियोजन एजेंसियों का काम सिर्फ किसी भी तरह से आरोपी को दोषी साबित करना नहीं होता है।





